
श्रद्धांजलि- शोक स्पीच
अल्फ़ाज़ों की फ़ितरत पानी-सी है।
ढल जाते हैं हर साँचे में। कभी सस्ते और बाज़ारू हो जाते हैं, तो कभी बेशक़ीमती। कभी अफ़रात हो जाते हैं, तो कभी मोहताज़।
ये तुलते हैं, सजते हैं, सँवरते हैं...
घुलते हैं, नशा बन जाते हैं,
बिखरते हैं, टूटते हैं, रूह हो जाते हैं...
अल्फ़ाज़ हैं—कभी कुछ भी नहीं और कभी ख़ुदा हो जाते हैं।
अल्फ़ाज़ों का वज़न उस शख़्स से पूछा जाए, जिसका कोई अपना फ़ौत हो गया है। भीतर पूरा समंदर है, आँखों से बरस रहा है। लेकिन वज़न इतना है कि एक शब्द निकलते नहीं बन रहा है।
क्योंकि वो शख़्स महज़ एक शख़्स नहीं था—एक रिश्ता, एक फ़र्ज़, एक उम्मीद, एक सरपरस्त, उसकी पूरी ज़मीन, आसमान या फिर पूरा जहान था।
वाक़ई मुश्किल है जो शख़्स पूरी किताब रहा हो, उसे काग़ज़ के एक पन्ने पर उतार देना... दरिया को उसके हिस्से के क़तरे देना।
बात चंद शब्दों की नहीं है, सही और सधे शब्दों की है। बात रस्म-रिवाज़ की भी नहीं है। दिल से निकली श्रद्धांजलि, जिसे दिल से लिखा गया हो।
हम इस घड़ी का वज़न बेशक नहीं बाँट सकते, लेकिन अंजुली भर सही और सधे शब्द ज़रूर दे सकते हैं।
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